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कवियों की जननी भारत मां

                
                                                         
                            मेरी भारत मां कवियों की जननी,
                                                                 
                            
कवियों के सपने सजाती रहो मां ।
विमल ज्ञान सौरभ की दरिया हृदय में बहाती रहो मां ,
सदा धर्म की कटुता मिटाकर,
मनुष्यता की भाषा सिखाती रहो मां।
मेरी भारत मां कवियों की जननी,
कवियों के सपने सजाती रहो मां।
सदा छांव आंचल करके,
मधुर ज्ञान अमृत पिलाती रहो मां ।
भटक न जाए ये कवि अपनी डगर से,
पकड़ हाथ लिखना सिखाती रहो मां।
मेरी भारत मां कवियों की जननी,
कवियों के सपने सजाती रहो मां।
हरिकेश को भी अपना बेटा मानकर,
कविता की सच्ची राह पर चलना सिखाती रहो मां।
मेरी भारत मां कवियों की जननी,
कवियों के सपने सजाती रहो मां।
हरिकेश यादव बी.एच.यू.


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6 वर्ष पहले

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