आज रो रही है संस्कृति मानव की मनुष्यता पर
भीग रहा है उसका दामन मानव की दुर्बलता पर।
हाय रे मानव! हाय रे मानव ! तेरी अश्रुपूर्ण कहानी
लूटी जा रही है आज संस्कृति की जवानी ।
वासनाओं का वशीभूत होकर भुला रहा है संस्कृति
हाय रे मानव!हाय रे मानव! कैसी है ये तेरी कृति।
हंस रहा है आज मानव अपनी ही मूर्खता पर
रो रही है आज संस्कृति मानव की दुर्बलता पर ।
ईर्ष्या जनम गई है तेरे अन्दर लेकर दानव का अवतार
हाय रे मानव! हाय रे मानव ! क्यों कर रहा है तू अपनी संस्कृति का संहार ।
तू भूल गया अपने पूर्वजों को जिसने बनाया था यह विधान
वासनाओं की क टा र से क्यों का ट रहा है इसका मान ।
हरिकेश भी कर रहा है विलाप आज इसकी विह्वलता पर
रो रही है संस्कृति आज मानव की मनुष्यता पर ।
हरिकेश यादव , काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी ।
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