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बनारस

                
                                                         
                            ऐ बनारस ! तेरा अंदाज़ बड़ा अनोखा है -
                                                                 
                            
तू सच में काशी है या धोखा है ।
तेरी मिट्टी का इतिहास बड़ा है -
फिर तू क्यों शांत पड़ा है ?
तेरी गालियां तुझको अनुशासित करती हैं
तुझको समय की सदियां परिभाषित करती हैं।
शहरों का तू राजा है , बसता है तू गंगा के तट पर
स्वर्ग सृजन का साधन है तू ।
फिर तू उदास क्यों है ?
तेरी शिराओं में बहती है समता की धार
फिर भी तू क्यों ढोता है विवशता का भार ।
तू साहित्य का संसार है
धर्म का आधार है
प्यार का प्रमाण है
संगीत का उपहार है
ज्ञान का अवतार है
तू दिव्य दर्पण है
तुझको मेरे काव्य का समर्पण है ।
हरिकेश यादव ,काशी
हिंदू विश्वविद्यालय ,वाराणसी।



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6 वर्ष पहले

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