फुरसत है तो बियर चलेगी, घर को आओ।
धन्ना के बंडल, पिछवाड़े
अग्निशिखा से भड़के
तणखे मोहिनी रूप धरे
आँख किसी की फड़के
अनहोनी गप्पों की गठरी माथे में भर लाओ।
यारों की
बकबक सुनकर भी
तिरछे बाण न डालो
इठलाती हाला से
दुखड़ों के खटराग न पालो
मयखाने की मादक महफिल, में मुहर्रम न मनाओ।
ऊर्जा का उफान,
गति तेजी से आगे ही बढ़ती
सुधियाँ सहमी, चली कल्पना
रंभा सिर पर चढ़ती
चंचल चितवन करें इशारे, आओ, मुझे मनाओ
पीते पीते अनुभव बाँटे
कर्मो की अच्छाई
तंत्री नाड़ी की सुर-लय में
यादों की परछाई
इंगला पिंगला सुर बजने दो, ध्यान योग में जाओ।
-हरिहर झा
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