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वही राग वही द्वेष

                
                                                         
                            ये टूटते रिश्ते
                                                                 
                            
और फब्तियां भरते बाप
घर के किसी कोने में
सिसकियां लेती मा
परवरिश को भूलते बच्चे
प्यार
जायज है या ना जायज
पर
रिश्तो को डोरियों को
तोड़ देता है
और
हस्त खिलता परिवार
इस सदमे को झेल नही पता
जिंदगियां उजड़ जाती है
और परिवार पर लगता दाग
झिंझोड़ कर रख देता है
परवरिश
और सब शांत
सहमे
आंखे छुपाते
घुटते
दुबकते
और फिर
वही राग वही द्वेष
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7 घंटे पहले

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