आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

टकराता चल

                
                                                         
                            सीमा
                                                                 
                            
का भूगोल
न बिगड़े
बना चमन
फिर से ना
उजड़े ,
वर्दी की
लाज
बचाता चल
टकराता
चल
टकराता चल
घर की
याद
सताएगी
मां की
याद भी आएगी
पर
अपना फर्ज
निभाता चल
टकराता चल
टकराता चल
स्याह न हो
कश्मीर
की घाटी
प्यारे
मेरे देश की माटी
मां का
दूध
बचाता चल
टकराता चल
टकराता चल
सीमा
पर ही
डटे रहोगे
माइनस में ही
खड़े रहोगे
आतंक
वाद के अड्डे पर
रह-रह
बम बरसाता चल
टकराता चल
टकराता चल
नहीं
डरे गलवान में
हम सब
नहीं डरे
डोकलाम में हम सब
भारत
मां की जय बोलो
बूटों से
धूल उड़ाता चल
टकराता चल
टकराता चल
-हंस नाथ यादव
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर