सृष्टिको पालनहारो, जगतको रखवारो,
रूप धर कान्हाको वु, पृथ्वीपर आयी से ।
पुरो ब्रह्मांड जिनको, तोंडमा समाय गयो,
नहानसो टोपलीमा, विधाता समायी से ।
आय देवकीको लाल, अधर्मी कंसको काल,
मथुरालं वृंदावन, नंद घर आयी से ।
रास रचैय्या वू कान्हा, बंसी बजैय्या वु कान्हा,
सप्पाई गोपीइनको, मनमा समायी से ॥१॥
कान्हा नटखट खोर, दुध, दही, लोणी चोर,
ग्वाल-बाल सँग जाय, मटकी वु फोड़ं से ।
पूतनाको प्राण लेसे, बैरींला चकमा देसे,
पिट पिट असुरला, जमकर झोड़ं से ।
बंसरीकी छेड़़ तान, टवकारं गोपी कान,
वेणुगीत गावं कान्हा, सुध-बुध मोड़ं से ।
भक्तको वु त्राण हरं, पापीको वु नाश करं,
चरण-कमल वोका, जग-फंदा तोड़ं से ॥२॥
कान्हा वु माखनचोर, चरावं से गायी ढोर,
सँग वोको ग्वाल-बाल, मुरली बजावं से ।
कालिन्दीको विषहारी, साड़ी चोरं से बिहारी,
कालिया को डोस्कीपर, नाच वु देखावं से ।
इन्द्रको घमंड तोड़ं, प्रेमको नातो वु जोड़ं,
बाेटपर गोवर्धन, देखके उठावं से ।
'गोकुल' भगत तोरो, सँभाल जीवन मोरो,
संकट हरन कान्हा, सबला वु पावं से ॥३॥
-गोवर्धन बिसेन ‘'गोकुल'
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