आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

धरा की व्यथा

                
                                                         
                            लेखनी से लिखू, भारती की कथा |
                                                                 
                            
काव्यमें भी लिखू, मै धरा की व्यथा ||
रो रही भारती, हो रही है दुखी |
देख माँ को दुखी, आप कैसे सुखी ||

खो रहे अस्मिता, वृक्ष काटे सभी |
प्राण रक्षा नहीं, आप पाते कभी ||
आपगा सूखती, पाँव जल भी जले |
छोड़कर संविदा, अब कहें किस भले ||

सून-सी रात है, चाँदनी लाजती |
बोलती अब न ये, वायुरी कांपती ||
क्यू समझते नही, भूमि के पीर को |
मूर्ख मानव यहाँ, खोजता नीर को ||

बोलते वृक्ष अब, मौनता त्यागते |
फूल काँटे सहे, गंध भी जागते ||
पुष्प हों या मनुज, भाव प्यारे लिए |
प्रेम ही सत्य है, द्वेष को मत पिए ||

छोड़ दो स्वार्थ को, जोड़ लो प्राण को |
सींच दो प्रेम से, प्यासती जान को ||
अस्मिता अब जगे, आत्म के बोध से |
मातृभू के तभी, बच सके क्रोध से ||
-गोवर्धन बिसेन "गोकुल"
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
12 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर