लेखनी से लिखू, भारती की कथा |
काव्यमें भी लिखू, मै धरा की व्यथा ||
रो रही भारती, हो रही है दुखी |
देख माँ को दुखी, आप कैसे सुखी ||
खो रहे अस्मिता, वृक्ष काटे सभी |
प्राण रक्षा नहीं, आप पाते कभी ||
आपगा सूखती, पाँव जल भी जले |
छोड़कर संविदा, अब कहें किस भले ||
सून-सी रात है, चाँदनी लाजती |
बोलती अब न ये, वायुरी कांपती ||
क्यू समझते नही, भूमि के पीर को |
मूर्ख मानव यहाँ, खोजता नीर को ||
बोलते वृक्ष अब, मौनता त्यागते |
फूल काँटे सहे, गंध भी जागते ||
पुष्प हों या मनुज, भाव प्यारे लिए |
प्रेम ही सत्य है, द्वेष को मत पिए ||
छोड़ दो स्वार्थ को, जोड़ लो प्राण को |
सींच दो प्रेम से, प्यासती जान को ||
अस्मिता अब जगे, आत्म के बोध से |
मातृभू के तभी, बच सके क्रोध से ||
-गोवर्धन बिसेन "गोकुल"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X