शाम का अंधेरा सुबह के उजाले को खाने लगता है,
गाँव-गली का हर मोड़ याद आने लगता है,
जैसे-जैसे त्योहार नजदीक आने लगता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X