सोंचा अनगिनत बार स्वयं पर मँथन कर लूं ,
मनभावों को जान आत्म निज चिंतन कर लूं ।
सम्मुख रख लूँ सभी अनकही दुखित व्यथाएँ ,
विचलित करती हर कुंठा का खंडन कर लूं।
शीश उठाते दूषित स्मृति चिन्ह दुखते गहरे,
दिव्य ज्योति प्रज्वलित कर सारे तर्पण कर लूँ।
कठिन नहीं है स्वयं निरीक्षण प्रयत्नशील बन,
परिभाषित आकलनों का संकलन कर लूं।
वाद प्रतिवाद प्रतिबंधित कर आशा जोड़ी,
प्रचलित मिथक विवादों का प्रबंधन कर लूँ।
गीतांजलि गुप्ता
नई दिल्ली
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