आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आत्ममंथन

                
                                                         
                            सोंचा अनगिनत बार स्वयं पर मँथन कर लूं ,
                                                                 
                            
मनभावों को जान आत्म निज चिंतन कर लूं ।

सम्मुख रख लूँ सभी अनकही दुखित व्यथाएँ ,
विचलित करती हर कुंठा का खंडन कर लूं।

शीश उठाते दूषित स्मृति चिन्ह दुखते गहरे,
दिव्य ज्योति प्रज्वलित कर सारे तर्पण कर लूँ।

कठिन नहीं है स्वयं निरीक्षण प्रयत्नशील बन,
परिभाषित आकलनों का संकलन कर लूं।

वाद प्रतिवाद प्रतिबंधित कर आशा जोड़ी,
प्रचलित मिथक विवादों का प्रबंधन कर लूँ।

गीतांजलि गुप्ता
नई दिल्ली
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर