मैं अपनी हर नज़्म में, हर गज़ल में,
बस तेरा ही अक्स बनाता हूँ,
मगर जब बात आती है नाम की,
मैं कलम वहीं रोक जाता हूँ।
ऐसा नहीं कि मुझे,
तेरे नाम से मोहब्बत नहीं,
या दुनिया के सामने,
तेरा हाथ थामने की हिम्मत नहीं।
बात बस इतनी सी है जान-ए-मन,
कि यह ज़माना बड़ा अजीब है,
यहाँ प्यार को इबादत कम,
और तमाशा ज्यादा समझा जाता है।
मैं नहीं चाहता कि मेरी शायरी के शोर में,
कोई तुझ पर उंगली उठाए,
मेरी मोहब्बत की चर्चा के कारण,
तेरी इज़्ज़त पर कोई आंच आए।
इसीलिए, मैं जज़्बात तो सारे लिखता हूँ,
पर तेरा नाम कागज़ पर नहीं उतारता,
मैं तुझे दुनिया की नज़रों से बचाकर,
बस अपने दिल में पुकारता।
लोग पढ़ते हैं, वाह-वाह करते हैं,
और पूछते हैं—"आखिर वो है कौन?"
मैं बस मुस्कुरा देता हूँ,
ताकि मेरा इश्क़ रहे आबाद, और तू रहे महफूज़।
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