बड़ी मासूमियत से तुमने, अपने होठों से चाशनी टपकाई,
अपने बारे में कुछ ना कहा, और सारी गलती हमारी बताई।
पूछने जो गए थे हम, अपनी ही उलझनों का सबब,
तुमने आँखों को ऐसे नचाया, कि हमनें ही माफ़ी मंगाई।
कमाल का हुनर है तुम्हारा, यह बात पलटने वाला,
खता खुद करते हो, और सज़ा की अर्जी हमारी लगाई।
हम दलीलें रखते रहे, पन्नों पर लिखकर वफ़ा की,
तुमने एक मुस्कुराहट फेंकी, और सारी वकालत हराई।
जानते हैं हम कि यह खेल है तुम्हारी शरारत का,
मगर, तुम खुश रहो जीतकर, इसलिए हमने यह बाजी गँवाई।
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