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जीवन और जीना

                
                                                         
                            नित निज आघातो- प्रतिघातों से, गया हार मैं अब था।
                                                                 
                            
कहने को कुछ शेष नही था, सुनना ही बस संभव था ||

सुना कभी था ईश्वर भी है, करता जग में न्याय बराबर |
क्षीण धारणा हुई है पर भी, आस न छोड़ी है ता-पर ||

सीख यही कि सखे कभी भी, रहना मत तू भरमाया।
जंगल से जन निकल तो आया, जीना सीख न पाया ।।

जोड़ी – तोड़ी, तोड़ी – जोड़ी, है यह माला बारम्बार ।
गाँठे ज्यादा मोती कम हैं, अब न टूटे यही विचार ||
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3 वर्ष पहले

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