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अनदेखा प्रेम

                
                                                         
                            बिना देखे ही तुमसे हम मोहब्बत कर रहे हैं,
                                                                 
                            
स्वप्न में आई थी जब से, तब से तुम पर मर रहे हैं।
देखते हैं हर जगह पर, तुम नजर आते नहीं,
आजकल हम याद में तेरे ही जी और मर रहे हैं।
खयालों में ही तेरी अब हम मूरत गढ़ रहे हैं,
यह कैसी तिश्नगी है, जो हम हर पल सह रहे हैं।
( तिश्नगी = प्यास/तड़प)
तुम्हारे वास्ते दुनिया को हम भूल बैठे हैं,
बस एक तुम्हारी धुन में ही आगे बढ़ रहे हैं।
हवाओं से तुम्हारा हम पता अब पूछते हैं,
हर एक आहट पर क्यों चौंक कर हम देखते हैं?
फासला यह जिस्म का शायद कभी मिट ना सके,
मगर रूह से रूह का रिश्ता हम जोड़ रहे हैं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 महीने पहले

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