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दरख्त़ और परिंदा

                
                                                         
                            परिंदा उड़ गया उस दरख़्त से
                                                                 
                            
जो उसका अपना, अजीज़,प्यारा था,
करता भी और क्या भला
उड़ने के अलावा और न कुछ चारा था,
दरख़्त की हमेशा से चाह थी
उस पर हो कई ज़िन्दगियाँ आबाद,
सो हुआ भी यही
दरख़्त पर अब घुसपैठियों का घरबार था,
दरख़्त को ना पहले था कोई मसला
ना अब कोई मलाल था,
एक परिंदा उड़ गया तो क्या
अब पूरा झुन्ड आबाद था,
कितनी यादें कितनी बातें जुड़ी थी उस दरख़्त से पर खैर
इस दफा परिन्दें की इज्ज़त और वज़ू का सवाल था,
तकलीफ़ तो हुई और होती भी क्यूँ ना
वो दरख़्त,दरख़्त ही नहीं उस परिंदे का पहला प्यार था।
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3 वर्ष पहले

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