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बस्ता उम्मीदों का

                
                                                         
                            घर से जो उम्मीदों का बस्ता लिए निकले हैं
                                                                 
                            
इस अनजान सफर पर जो
तो धीरे-धीरे समय के साथ-साथ
कांधो पर वजन लगातार बढने सा लगा है
शरीर की दृढ़ता और मन की स्थिरता
अब वो पहले जैसे स्तर पर नहीं रही
शरीर मांगता है, थक कर दो पल आराम के
मन मांगता है कुछ समय घोर सुकुन के
मगर फिर, कांधो को उचकाते हुए
उस बस्ते के बढ़ते वजन को महसूस करता हूँ
वो बस्ता उम्मीदों का,
जिसे मे घर से लेकर आया था
अब वही बस्ता,
लौटकर मुझे घर नहीं जाने देता अधूरी उम्मीदों के साथ ....
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2 वर्ष पहले

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