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मेरी मां

                
                                                         
                            बिखरी बिखरी ख्वाहिशें
                                                                 
                            
समेट लिया करो
कुछ गम दे दो थोड़ी हंसी
ले लिया करो....

कितना भागोगी तुम
वक्त के पीछे-पीछे
थोड़ा आराम खुद के लिए भी
सोच लिया करो...
तुम बैठती हो तो वह जगह भी सोचती होगी
क्या जगह नहीं है इसको भी मेरे सिवा....

ताने देते होंगे तेरे
चौक चूल्हे भी तुझे
कहते होंगे जिम्मेदारियों से
मां मुक्त भी होगी क्या....

सब के पीछे दौड़ती
क्यों तू रुकती नहीं
दिन के दो और रात के 12:00 बजे
क्या तू थकती नहीं....

अपने लिए वक्त निकाल
कभी खुद को भी सजाया कर
कभी देवी मंदिर कभी चौपाटी
कभी कहीं जाया कर....

तू है तो घर मुझे अपना घर सा लगता है
सब रहते हैं तो भी तेरे बिन सूना सूना सा लगता है..

बहुत फिक्र होती है
पापा को भी अक्सर मां
तुझे बोलते नहीं तो क्या
हमें बोलते हैं अक्सर मां....

देख तो सही पीछे की बहुत कुछ छूट रहा है मां
कुछ तो है जो तेरे अंदर थोड़ा टूट रहा है मां...

हम तो तुझे बोल के अपने मन की कह लेते हैं
पर तू अपने मन की कैसे सह लेती है...

रोज वही ड्यूटी तेरी
सबकी पसंद का सोचना
और अपनी सारी ख्वाहिशों को
हर पल यूं ही छोड़ना...

चैन सा सुकून सा
तेरे पास आकर लगता है मां
दौड़ के आ जाऊं तेरे पास
बस दिल यही कहता है मां....

कभी घर की केयरटेकर
कभी चौकीदार से लगती है तू
सारी खबरें पढ़ लूं
जिंदगी का अखबार सी लगती है तू

कैसे कर लेती हो मां तुम
इतना सारा समर्पण
चाहती नहीं कुछ बदले में
करती हो सिर्फ अर्पण
सिर्फ अर्पण
सिर्फ अर्पण सिर्फ अर्पण
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2 वर्ष पहले

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