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जिंदगी थी मुझ में

                
                                                         
                            मेरे अश्क का हर बूंद मुझ में सिमट गया ....
                                                                 
                            
जिंदगी थी मुझ में पर जीने का जज्बा मर गया ....

सोचा हौसलों से खुद को कुछ निखार ले
बच्चा था मन मेरा एक साए से डर गया...

दोस्ती निभाते निभाते कब हम दुश्मन हुए ..
कि हम साया मेरा ही मुझसे बिछड़ गया ...

सजदा करने को सर झुकाया था कलम करने को नहीं
कमबख्त वह मेरे जिस्म को टुकड़ा टुकड़ा कर गया ...

उम्मीद ने वादा किया था की लौटेंगे जरूर
वह पहर आया नहीं दोबारा जब से शहर गया...

अपना आशिया भी भला जलाता है कोई
फिर भी कई चिंगारी मैं आशिए में भर गया ...

जैसे मर गया था मैं ख्वाहिशें ने यूं छोड़ मुझे
कतरा कतरा सांसों का जाने क्यों मुझसे बिछड़ गया...

जिंदगी थी मुझ में पर जीने का जज्बा मर गया ....जज्बा मर गया.....
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2 वर्ष पहले

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