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पक्षी परों से नहीं हौसलों से उड़ा करते हैं।।

                
                                                         
                            पक्षी परों से नहीं, हौसलों से उड़ा करते हैं,
                                                                 
                            
गगन की नाप पंख नहीं, संकल्प ही नापा करते हैं ।।

नीड़ न था, तिनका-तिनका उसने स्वयं जुटाया,
आँधी ने तोड़ा, पर उसने पुनः बनाना सीखा।
पंखों में शक्ति नहीं, हृदय में ज्वाला है,
जो गिरा धरा पर, वही तो पुनः उड़ना सीखा।

शून्य गगन में पथ नहीं, पर दिशा तो मन में है,
तूफान पूछता - "तेरा साहस कितना?"
विहग कहता - "मेरी उड़ान नापो मत परों से,
मेरे श्वास में बसा है अनंत का सपना।"

पर्वत कहता - "तू लघु है, मैं महान हूँ,"
सागर कहता - "तेरी सीमा यहीं तक है।"
पक्षी हँसता - "हे पर्वत! तू अचल है, मैं चंचल,
मेरी सीमा वही, जहाँ मेरा मनक तक है।"

नभ में उड़ान केवल पंखों का विलास नहीं,
यह तो आत्मा के विश्वास का इतिहास है।
जो भय से धरा पर ही पंख समेटे रहे,
उनके लिए तो सम्पूर्ण गगन ही कारावास है।।

इसलिए हे मानव! तू विहग से सीख ले,
जीवन में पंख नहीं, हौसले प्रधान हैं।
परों से तो केवल वायु को चीरते हैं,
हौसलों से तो भाग्य के विधान बदलते हैं।
याद रख -
पक्षी परों से नहीं, हौसलों से उड़ा करते हैं,
जो उड़ने का साहस रखते हैं, वही आकाश को जीता करते हैं।
-गौरव कुमार तिवारी
 
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23 मिनट पहले

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