आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

किस्सा

                
                                                         
                            छोड़ो तुम मत आओ अभी
                                                                 
                            
ये किस्सा थोड़ा लम्बा चलने दो।
मै जला हूं जिस आग में
मुझे थोड़ा और जलने दो।

छोड़ो फिकर इसके अंत का
ये किस्सा थोड़ा हसीन तो बनने दो।
धारा ये अश्कों की थोड़ा और बहने दो
अभी तो केवल नदी बढ़ी है,समन्दर तो बनने दो।

तुम करो विलंब थोड़ा आने में
मुझे न कोई ऐतराज़ होगा।
अगर चले ये किस्सा अगले जनम तक भी
तब भी तुम्हारा इंतज़ार होगा।

तुम्हे नहीं आना होगा तो ठहर जाना
ये किस्सा मैं एक पल में भुला दूंगा।
बस देखकर थोड़ा मुस्कुरा देना
मैं कई सदियां बिता दूंगा।

गौरव कुमार यादव   


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर