छोड़ो तुम मत आओ अभी
ये किस्सा थोड़ा लम्बा चलने दो।
मै जला हूं जिस आग में
मुझे थोड़ा और जलने दो।
छोड़ो फिकर इसके अंत का
ये किस्सा थोड़ा हसीन तो बनने दो।
धारा ये अश्कों की थोड़ा और बहने दो
अभी तो केवल नदी बढ़ी है,समन्दर तो बनने दो।
तुम करो विलंब थोड़ा आने में
मुझे न कोई ऐतराज़ होगा।
अगर चले ये किस्सा अगले जनम तक भी
तब भी तुम्हारा इंतज़ार होगा।
तुम्हे नहीं आना होगा तो ठहर जाना
ये किस्सा मैं एक पल में भुला दूंगा।
बस देखकर थोड़ा मुस्कुरा देना
मैं कई सदियां बिता दूंगा।
गौरव कुमार यादव
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