वक्त के उस मोड़ पर तुम छूट गए,
जहां लफ्ज़ खामोश थे और आंसू कह गए।
ना कोई शिकवा ,ना कोई गिला रहा,
बस दिल में इक सूनापन रह गया।
तेरे जाने की आहट तो थी कहीं,
यह यकीन नहीं हुआ कि तू सच में गई।
जो पल साथ गुजारे थे कभी,
अब वो ही पल सजा बन गए अभी।
तेरी हंसी की गूंज अब भी है इस घर में,
तेरे बिना सब अधूरा सा लगता है हर पहर में।
मैं हर रोज उस मोड़ पर जाता हूं,
जहां आखिरी बार तेरा हाथ थामा था।
कुछ रिश्ते मुकम्मल नहीं होते शायद,
पर अधूरे होकर भी अमर हो जाते है।
बिछड़ना अगर किस्मत थी तो मंजूर है ,
पर तुझे भुला पाना नामुमकिन जरूर है।
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