किनारा ज़रूर तुमने कर लिया हमसे,
पर जज़्बात का क्या करोगे..
तल्ख़ यादें गर भुला भी दीं तुमने
तो ख़ूबसूरत लम्हात का क्या करोगे..
हो अगर कोई तो इत्तेला कर देना हमें
ज़्यादा पाकर मुज़्जात का क्या करोगे
इश्क़ करने में ज़रूर होशियारी बरतना
धोखा खाकर फिर एहतियात का क्या करोगे...
है ज़माना परेशान इस ख़ामोशी से मेरी
तुम सुनकर भी मेरी बात का क्या करोगे..
क्यूँ पूछना है आख़िर ख़ैरियत मुंसिफ
अब जानकर मेरे हालात का क्या करोगे..
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