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गुलों से टूटकर बिखरे हुए हम,

                
                                                         
                            गुलों से टूटकर बिखरे हुए हम,
                                                                 
                            
किसी के खेल के पासे हुए हम।

न मंज़िल है, न कोई रास्ता है,
मगर उम्मीद से जागे हुए हम।

ज़बाँ पर लफ़्ज़ भी आते नहीं अब,
हुए ख़ामोश कुछ कहते हुए हम।

रक़ीबों को पशेमाँ कौन करता,
ख़ुद अपनी घात में बैठे हुए हम।

मुसलसल चल रही हैं ऐ हवाएँ,
मुसलसल हैं मगर ठहरे हुए हम।

यगाना है कि यकता है वो क्या है,
तिरे किरदार में ढलते हुए हम।
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एक घंटा पहले

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