आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बर्बादियों का शोर है, आँखों में ख़ूँ नहीं,,

                
                                                         
                            बर्बादियों का शोर है, आँखों में ख़ूँ नहीं,
                                                                 
                            
यूँ देखते हैं लोग कि जैसे मैं हूँ नहीं।

इस हाल-ए-मुफ़्लिसी में ये बेगानगी तेरी,
कहनी बहुत सी बात, मगर कुछ कहूँ नहीं।

जिसको मिली बुलंदी, वही हो गया शनास;
बिकता तुम्हारे शहर में आईना क्यूँ नहीं?

राहों के दरमियान में पत्थर हैं ख़ार भी,
दरिया हूँ मैं बताओ कहाँ तक बहूँ नहीं।

जिसमें तमाम दर्द के होते हैं मशवरे,
बेजा रसाले होंगे उन्हें मैं पढूँ नहीं।

गुलशन लिखूँ बहार लिखूँ हुस्न दिल फरेब,
कब तक तमाशबीन तमाशा लिखूँ नहीं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर