आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आँख में रातभर ख़्वाब सा रह गया

                
                                                         
                            आँख में रातभर ख़्वाब सा रह गया,
                                                                 
                            
चाँद सोया था मैं जागता रह गया।
कुछ कमी थी मेरे दिल में जाने कहीं,
उज़्र का आप में भी नशा रह गया।

फूल, गुलशन, चमन सामने सब मेरे,
इश्क़ का हुस्न से सामना रह गया।

सब बदलते रहे, वो न बदला कभी...
बेवफ़ा आज भी, बेवफ़ा रह गया!

कोई बस्ती थी, बीरान होती रही...
वो भी खामोशियों पे, अड़ा रह गया!

मोतबर, राहजन, सब चले ही गए,
वक़्त का आखिरी फ़ैसला रह गया।
— एजाज़ अहमद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर