आँख में रातभर ख़्वाब सा रह गया,
चाँद सोया था मैं जागता रह गया।
कुछ कमी थी मेरे दिल में जाने कहीं,
उज़्र का आप में भी नशा रह गया।
फूल, गुलशन, चमन सामने सब मेरे,
इश्क़ का हुस्न से सामना रह गया।
सब बदलते रहे, वो न बदला कभी...
बेवफ़ा आज भी, बेवफ़ा रह गया!
कोई बस्ती थी, बीरान होती रही...
वो भी खामोशियों पे, अड़ा रह गया!
मोतबर, राहजन, सब चले ही गए,
वक़्त का आखिरी फ़ैसला रह गया।
— एजाज़ अहमद
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