आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

काश तू मेरी गली से गुज़रे

                
                                                         
                            काश तू मेरी गली से गुज़रे,
                                                                 
                            
‎फिर से तेरा दीदार करूं ।
‎उस नुक्कड़ पर जब भी आए,
‎छत से इशारे हज़ार करूं ।
‎काश तू मेरी गली से गुज़रे ।
‎
‎मुस्कुराके तू देखे मुझको,
‎आंखों से तुझपे वार करूं ।
‎जो ना दिखूं मैं इक पल तो,
‎वापस मुड़ने को बेकरार करूं ।
‎काश तू मेरी गली से गुज़रे ।
‎
‎हाथ पकड़कर चले तू मेरा,
‎बीते पलों को फिर से याद करूं ।
‎बेफिकर रहूं ज़माने से और,
‎प्यार भी सरे बाज़ार करूं ।
‎काश तू मेरी गली से गुज़रे ।
‎
‎कभी प्यार तो कभी शरारत,
‎हद को भी अपनी पार करूं ।
‎होली आए तो तेरे गालों को,
‎चुपके से फिर रंग लाल करूं ।
‎ख़ैर.......
‎झूठे सपने संजोनें से मैं,
‎खुद को कैसे इनकार करूं ।
‎इक बार सही पर तू ही बता !
‎कब तक तेरी राह निहारूं,
‎कब तक तेरा इंतज़ार करूं ।
‎काश तू मेरी गली से गुज़रे,
‎फिर से तेरा दीदार करूं ।
‎-‎डी के तिवारी 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर