काश तू मेरी गली से गुज़रे,
फिर से तेरा दीदार करूं ।
उस नुक्कड़ पर जब भी आए,
छत से इशारे हज़ार करूं ।
काश तू मेरी गली से गुज़रे ।
मुस्कुराके तू देखे मुझको,
आंखों से तुझपे वार करूं ।
जो ना दिखूं मैं इक पल तो,
वापस मुड़ने को बेकरार करूं ।
काश तू मेरी गली से गुज़रे ।
हाथ पकड़कर चले तू मेरा,
बीते पलों को फिर से याद करूं ।
बेफिकर रहूं ज़माने से और,
प्यार भी सरे बाज़ार करूं ।
काश तू मेरी गली से गुज़रे ।
कभी प्यार तो कभी शरारत,
हद को भी अपनी पार करूं ।
होली आए तो तेरे गालों को,
चुपके से फिर रंग लाल करूं ।
ख़ैर.......
झूठे सपने संजोनें से मैं,
खुद को कैसे इनकार करूं ।
इक बार सही पर तू ही बता !
कब तक तेरी राह निहारूं,
कब तक तेरा इंतज़ार करूं ।
काश तू मेरी गली से गुज़रे,
फिर से तेरा दीदार करूं ।
-डी के तिवारी
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