" बुन्देली विरह गीत "
विधि ने कैसो खेल रचो है,
कि भोला रो रहे,
पार्वती के लाने शम्भू रो रहे,
पार्वती के लाने...
दक्ष के आँगन में सती पड़ी है,
छूट गयो संसार।
सती की देह कलेजे धरके ,
भोला चले अकुलाय l
कबहु इतेके कबहु उतेके,
कोनहु दिशा न सुहाय l
विधि ने कैसो खेल रचो है,
कि भोला रो रहे.....
सती चली जब छोड़के भोला,
सूना भयो कैलास।
नैनन में अब नीर भरो है,
मन में उठी करुण पुकार।
“सती-सती” कह शम्भू डोले,
रोवे बारम्बार।
विधि ने कैसो खेल रचो है,
भोला रो रहे पार्वती के लाने...
जटा बिखर गई, बह गई गंग की धार,
नैनन में अब नीर भरो है,
सूना भओ कैलास।
डम-डम-डम डमरू बाजे,
काँप उठी धरती सारी।
नटराज बने हैं भोले बाबा,
विरह की अग्नि भारी।
विधि ने कैसो खेल रचो है,
भोला रो रहे पार्वती के लाने...
डम-डम डमरू बाजे, धर-धर काँपे धाम,
गोरा जी के विरह में भोला,
भूल गयो निज नाम।
रोऊत-रोऊत शिव रूद्र बने हैं,
रूद्र बने प्रलयंकरी ।
नयनन में बसी पार्वती की मूरत,
कैसे भूलें शिव त्रिपुरारी।
जिनके संग हँसत रहे भोला,
जिनके संग हर साँझ।
आज वही पार्वती बिन,
सूनी लागे साँझ।
जिनके माथे चन्दा सोहे,
उनके आँसून नीर।
पार्वती के लाने शम्भू रोवे,
टूट गओ मन धीर।
विधि ने कैसो खेल रचो है,
कि भोला रो रहे पार्वती के लाने...
हे गिरिजा! तुम लौट आओ अब,
कैलास पुकारत आज।
भोला के सूने आँगन में,
भर दो फिर से साज।
विधि ने कैसो खेल रचो है,
प्रेम भयो लाचार।
शिव के आँसू बन गए बादर,
गूँज उठो संसार।
प्रेम जहाँ सच्चो होवत है,
विरह वहाँ है भारी।
भोला-गोरा की प्रेम-कथा,
रहे जगत में न्यारी।
-.प्रदीप बाबू
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