भाप बन उड़ चली,
हवा में पंख फैलाए,
एक ओस की मैं बूंद सी,
सपनों में उड़ान लिए,
नन्हें से हाथों में जान लिए,
कल की ना कोई फिक्र है,
डर का ना कोई ज़िक्र है,
हौसले बुलंद किए,
बढ़ चली मैं बढ़ चली,
एक ओस की मैं बूंद सी,
आसमान की सीमा को पार किए,
चल पड़ी में लक्ष्य के लिए,
सफ़र में एक चिंता हो गई,
लक्ष्य में मैं ऐसी खो गई,
की भूल गई मैं कहां गिरूंगी,
फूलों से टकराऊंगी या धूल में मिलूंगी,
बिन आस के फिर बढ़ चली,
एक ओस की मैं बूंद सी
- दृष्टि जैन
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
कमेंट
कमेंट X