त्रासदी की रचना
सोचा, न लिखूँ त्रासदी की रचना
खुद ही इसे कहानी न समझ बैठूँ
आपार दर्द और शोक लोगों की
उंगलियों की भेंट न चढ़ा डालूँ
किंतु वे भयावह दृश्य रह रह कर कहते
क्या जरूरी है,
हर स्थल का पर्यटन होना?
हर जलप्रपात का बिजलीघर होना?
हर खाली जगह इमारत होना?
हर पहुँचने की जगह गाड़ियां होना?
हर कार्य, उंगलियों के बस में होना?
अगर हां तो पूछना होगा
कितने पेड़ों की तिलांजलि दोगे?
कितनी नदियों को सूखने दोगे?
कितने पहाड़ों को टूटने दोगे?
कितनी खेतों को सीमेंट से मढोगे?
कितनी जमीन को प्लास्टिक से ढकोगे?
सोचो क्या चाहिए,
रफ्तार या पहुंचना?
पैकेट या भोजन ?
बिस्तर या निद्रा ?
अकेलापन या साथ?
कृत्रिम या प्राकृतिक?
सत्य निष्ठुर है
रास्ते जो चुनते हैं
समयानुसार नतीजे मिलते हैं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X