कुल ६ महीने गुजर गए
जब लिखा करता था मैं
विराम तो लिया था मैंने
इस “बीस” तारीख़ के
बन्धन से मुक्त होने….
सोचा था जब भी भाव
आएँगे, तभी कलम
उठा लिया करूँगा मैं
पर ये हो न सका…..
और विचलित राजीव
पूर्णतः सो भी न सका
ये बिखरे हुए अल्फ़ाज़
मेरे आप के समक्ष….
खुद को खुद से जगाने
व काल भैरव को बधाई
देने का प्रयास सा है!
कुछ इस कदर सिखाया
इन ६ महीनों के पड़ाव ने
पहाड़ों की तरह ख़ामोश हैं
आज के सब रिश्ते.....
जब तक खुद न पुकारें
आवाज़ उधर से नहीं आती
जरूरतें और नींद ज़िन्दगी में
कभी भी पूरी नहीं होती हैं
जो इन्सान जितनी सुविधा में है
वो उतनी ही दुविधा में है!
कोहरे और गर्द की लिपटी
चादर में अजीब आलम है
इस दिल और दिल्ली का
ना राहत है, ना दिखता रास्ता
तो क्यों दूर तक देखने की
कोशिश भर भी करूँ मैं
धीरे धीरे एक एक कदम
चलने का प्रयास करते जाऊँ
रास्ता स्वयं मिलता जायेगा
अतीत है कुछ भावपूर्ण सा
पर रहने के लिए पर्याप्त नहीं
भविष्य एक अच्छा सपना है
लेकिन सपना अपना सा नहीं
सिर्फ़ "आज" ही इक तोहफ़ा है
जिसमें शक की गुंजाइश नहीं
तो आज को ही जी लो
राजीव बाबू व याद दिलाते
रहा करो अपने आप को
हर माह के बीसवें दिन
हर जुलाई की बीसवीं पर
अपने मायावी जन्मदिन पर
कि समय नहीं बीत रहा तेरा
ये जीवन ही बीत रहा है।
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