विद्यार्थी की सोच;
एक जुमला था हवा में तैरता—
"फिर आगे क्या?"
अगर सचमुच कुछ ख़ास होता,
तो मैं रुकती,
हर बार हम ही औरों की पूछ करते रहे,
काश! कभी कोई हमारा भी रास्ता तकता।
हाँ, माना कि दिशा दिखाई है हमें कई बार,
पर हमारी खुद की रोशनी क्या कम थी भला?
जो सोचकर आई थी, वैसा कुछ तो है यहाँ,
पर ऐसा कुछ भी नहीं।
तो फिर ऊर्जा और समय का ज़ाया जितना कम हो—उतना बेहतर,
ग़लत जगह पर बने रहने से भला क्या ही बिगड़ेगा मेरा?
कोई छूटा हुआ सुनहरा मौका होता,
तो शायद मैं ज़रूर रुकती,
पर यह तो सिर्फ़ एक बेमानी दिन है,
जिसे कोई एक शिक्षक ख़ास नहीं बना पाया।
शिक्षक की सोच;
अब वक्त आ गया है छोड़ने का,
अभिमान अपने पद का, और यह झूठी 'सेल्फ़-ग्लोरी',
क्योंकि गुरु की पूरी परिभाषा ही बदल दी है जन-ज़ी ने।
मैंने बहुत चाहा कि माफ़ कर दूँ सबको,
और बड़प्पन में अक्सर शेखी भी बघार देती हूँ।
पर रोज़ जब अपनी शक्ल आईने में देखती हूँ,
तो सच सामने आता है—
एक भी माफ़ी मैंने दिल से नहीं दी।
माथे की वह शिकन, भौहों की कुढ़न,
बरसों से वहीं की वहीं खड़ी है।
चेहरे की कांति तो दिन के चैन से जुड़ी है,
और चैन तब तक नहीं, जब तक सब भूलती नहीं।
पर अगर भूल गई...
तो वही शोषण का चक्र फिर से डराता है।
अब तो इसका उत्तर ढूँढना अनिवार्य हो गया है—
क्या रास्ता माफ़ी देना है, या सब कुछ भूल जाना?
और अगर दोनों कर भी दिए...
तो आगे फिर नए लोग होंगे, और फिर वही चक्र!
अगर अकेली रह गई, तो अकेलेपन का भयावह भय,
पर अभी भी मेरी अकड़ मेरे साथ खड़ी है।
यह अकड़, जो इस खालीपन को और ख़ाली कर देती है।
इसका दोषी आख़िर कौन है?
मैं? मेरी अकड़? या कोई दूजा?
घायल करते रिश्ते, या यह भयावह अकेलापन?
चुनना तो हमें ही है...
क्या प्रकृति से बातें करके काम नहीं चलेगा?
या फिर ये पशु-पक्षी...
हाँ, काफी हद तक चलेगा,
पर उनकी भी तो अपनी सीमाएँ होंगी।
तो फिर...
आगे क्या?
-- डॉ. प्रीति
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