तेरे दर पर मेरा भी आशियाना था,
वो जो चमन में दरख़्त पुराना था।
ज़माना चाहे जो समझे मुबादा उस ठिकाने को,
मेरा रिश्ता यूँ उससे कई सदियों पुराना था।
उसकी शाखों पे मेरा बचपन झूला करता था,
हर पत्ता जैसे मेरा कोई अफ़साना था।
चिड़ियों की चहचहाहट में आवाज़ थी मेरी,
हर शाम वहाँ लौटना जैसे कोई बहाना था।
गिलहरी के लिए दाना, परिंदों के लिए घर,
उस दरख़्त का हर कोना बड़ा सुहाना था।
मैंने वहीं बैठकर ख़ुद को समझा था कभी,
वो साया नहीं, मेरे जीने का फ़साना था।
वक़्त बदला तो शहर बदलते चले गए,
मगर दिल में वही आँगन पुराना था।
लोगों ने काट दिया उसे एक दिन यूँ ही,
उन्हें क्या ख़बर—वो मेरा आशियाना था।
अब धूप उतरती है उस सूने चमन में,
जहाँ कभी हर तरफ़ मेरा ज़माना था।
तना तो गिर गया, मगर रिश्ता नहीं टूटा,
वो पेड़ नहीं—मेरी यादों का ख़ज़ाना था।
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