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औरत की चाहत

                
                                                         
                            ना नौकर चाकर, बडे़ बंगले, ना मोटर कार चाहती हूँ ।
                                                                 
                            
ना राजपाट, ना महंगे लते, ना गहनों से लदना चाहती हूँ।
ना ऊंचे बोल ताकत के, ना पद सिंहासन चाहती हूँ ।
ना वारिस बन कोई प्रोपर्टी, ना कोई बराबरी चाहती हूँ।
ना भूतल, ना ढेर कचरे का, ना जन्म से पहले मरना चाहती हूँ ।
ना नाटी काली मोटी कह, लज्जित होना चाहती हूँ।
ना बेची जाऊँ बाजार मे, ना जबरन ब्याह चाहती हूँ।
घरेलू हिंसा, दहेज की, ना बलि चढ़ना चाहती हूँ।
ना अबला बेचारी सी, ना दया किसी की चाहती हूँ।
सहमी सी किसी घूंधट मे, ना धर मे दुबकना चाहती हूँ।
ना' कह सकूं, जब चाहूँ, आबरू बचाना चाहती हूँ।
ना उछले इज्जत मां बाप की, उनका सम्मान चाहती हूँ।
देश का ऊंचा नाम करूँ, सर उठाकर जीना चाहती हूँ।
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एक वर्ष पहले

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