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पौधे की पुकार

                
                                                         
                            मेरे बगिया में लगा एक पौधा मुझसे यूँ बोला…
                                                                 
                            
“एक छोटा बच्चा हूँ मैं, डरता हूँ देखकर कटता परिवार…”

मेरे बगिया में लगा एक पौधा
डरते स्वर में मुझसे यूँ बोला

अभी एक छोटा बच्चा हूँ मैं,
बढ़ने को हुं सज्ज तैयार
पर देख कुल्हाड़ी हाथ में
डरता हूँ देख कटता परिवार।

तेज हवाएं जब रात में आई
पिता ने फैला लिए पात हजार
करने को बस मेरी रक्षा
तूफानों से लड़ने को थे वो तैयार

पर देख अभागा भाग ये मेरा
कौन सुनेगा मेरे दर्द अपार
मेरे सामने गिरते हैं रोज़,
मेरे अपने एक-एक कर बारंबार।”

कल जो पेड़ मेरी माँ था,
आज काटकर छोड़ दिया।
जिसने छाया दी, जीवन दिया,
उसे बेबस करके तोड़ दिया।

मेरे भाई की डाली टूटी,
हर अपने की जड़ें सूख गईं।
कुल्हाड़ी की हर एक चोट में,
मेरी उम्मीदें भी सिसक गईं।

मैं भाग नहीं सकता तुमसे,
मेरी जड़ों ने बाँधें पाँव
बस डर डर कर यह सोच रहा हूँ
कब मेरे भी लग जाए घाव?

तुम कहते हो सिर्फ़ पेड़ कटा है,
पर सच इतना सरल नहीं।
मेरे संग उजड़ा जंगल भी,
और तुम भी ठहरे safe नहीं।”

मेरे संग उजड़े पंछी
छाया वनचर की नष्ट हुई
धरती मा का आंचल सूखा
वर्षा के बदरा कही नहीं

तुम काट रहे खुद अपना कल
कोई तुमको समझाए कैसे
मैं बालक एक नन्हा सा पौधा
तुम्हें बंजर भविष्य दिखाऊं कैसे

इतना कह वह चुप हो गया,
पत्तों ने नयन झुका लीं है
मैं समझ गया बस पेड़ नहीं,
हमने सांसे ही अपनी गंवा दी है
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6 महीने पहले

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