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बचपन

                
                                                         
                            बचपन से जो गुजरो तो
                                                                 
                            
यार वही मिलते हैं
जो रूठे खुद और माने खुद
दिलदार वही मिलते हैं,

संकरी उन गलियों के
किस्से आज भी वही हैं
चेहरे नये से हैं , कुछ !
बातें आज भी वही हैं ,

छुपम - छुपाई की गिनती में
चोर पकड़ने को भाग रहे
गिल्ली डंडे की चाल में
सोच रहे कब दांव लगे ,

जो जीते तो , गलियों में सुन जाये
ऐसा शोर मचाते हैं
और जो हारे तो , हँस - हँस कर
लोट - पोट हो जाते हैं ,

समय बदल ज़ाये कितना भी
बचपन के हर बच्चे में ,
किरदार वही मिलते है
बचपन से जो गुजरो तो
यार वही मिलते हैं ।।
-ममता भक्कड़
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2 वर्ष पहले

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