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परिंदों की चीखें...

                
                                                         
                            परिंदों की चीखें
                                                                 
                            

खून से लथपथ एक परिंदा
मिडिल ईस्ट से भारत आया
खून से लिखा जो,अमन का ख़त
रो-रोकर सबको सुनाया

कुछ लोग यहाँ मुसोलिनी बने
कुछ ने धारा हिटलर का भेष
कायनात अब जलने को हैं
मिलकर बचा लो सारे देश

जब-जब विश्व में युद्ध हुए हैं
सृष्टि का विनाश ही हुआ
पशु-पक्षी हों या मानव सभ्यता
सबका ही सत्यानाश हुआ

गोला-बारूद की आँचों में
मासूमों की चीखें घुटी हैं
जीत किसी की भी हो विश्व में
हर युद्ध में मानवता लुटी हैं

मेरी-तेरी ज़िद से ऊपर
मानवता ही सबसे बड़ी हैं
हिंसा,नफ़रत,युद्ध को रोको
पृथ्वी पर संकट की घड़ी हैं

हिरोशिमा अब और नहीं
नागासाकी ना दोहराना हैं
इतिहास की काली भूलों से
हम सबको सबक सीखना हैं

पशु,पक्षी और मानव जाति
सब पर ईश्वर का प्यार रहा
हम सबने बस नफ़रत बांटी
हाथों में हिंसक हथियार रहा

धरती माँ की छाती छलनी
अंबर भी अब तो रोता हैं
जो बोता हैं नफ़रत का विष
वो मौत की फसल ही बोता हैं

तानाशाहों की ज़िद को रोको
वरना क़यामत आ जाएगी
जो चले परमाणु अस्त्र कभी
पृथ्वी पर लाशें बिछ जाएगी

तुम भी जीओ और जीने दो
बुद्ध की करुणा रहने दो
गाँधी की अहिंसा अपनाओ
दुनियाँ में प्रेम की गंगा वहने दो

आसमान में उड़ते परिंदे
खून से लथपथ गिर रहे
युद्ध विराम हो, युद्ध विराम हो
मरते-मरते यह कह रहे
 
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1 hour ago

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