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लोकतंत्र और पहरेदार ...

                
                                                         
                            लोकतंत्र और पहरेदार
                                                                 
                            

यह देश है महात्मा गांधी का,हिटलर का कोई मचान नहीं
जो अधिकार मांगने निकले,उन पर हिंसा का अधिकार नहीं

संविधान की इस चौखट पर,कैसी यह काली रात ढली
अधिकार माँगने वालों पर,क्यों लाठी और बंदूक चली?

हर आवाज़ दबाने की ज़िद में,क्या कानून धुआँ कर दोगे तुम?
लोकतंत्र की पावन रूह को,क्या ऐसे फ़ना कर दोगे तुम?

तख्तों पर जो राजा बैठे,भूल गए इतिहास का सच
जब-जब जनता पर जुल्म बढ़ा,तब-तब पलटा सत्ता का रथ

लोकतंत्र के इस मंदिर में,अब कैसे कैसे पहरेदार बने
जो ढाल थे कल तक अपनों की,आज वही क्यों तलवार बने?

अन्याय की इस आंधी में,सब हाल-बेहाल हुए बैठे हैं
न्याय की आँखें मूँदे कर,सब शैतान मसाल लिए बैठे हैं

सुन लो ऐ सत्ता के भूखों,यह देश कभी न झुकेगा
अन्याय भरे फरमानों पर,हर शख्स इंकलाब बोलेगा

लहू उबल रहा नौजवान का,अब चुप नहीं वह रहने वाला
हर जुल्म का हिसाब चुकाने,यह तूफ़ान अब हैं आने वाला
-महेश यादव
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एक घंटा पहले

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