चुक गए कितने हम बचे कितने,
कमर हमारी है लगी झुकने।
मुझको दिल ने बनाया यायावर,
कहीं देता नहीं हमे टिकने।
पाँव मैंने बचाए ठोकर से,
रेंगने से मगर छिले घुटने।
मेरे यारों की मेहरबानी से,
दिल हमेशा लगा मेरा दुखने।
हम हरम में गए न मंदिर में,
हर जगह देखे झमेले इतने।
क़द मकानों का हो गया ऊँचा,
हम तो जितने थे रह गए उतने।
बे-ज़बाँ बज़्म में कई आए,
सारे मिल के हमें लगे अपने।
मुँह छुपाते हुए दिखे 'गौतम',
जो हैं बाज़ार में बैठे बिकने।
-डॉ. कुँवर वीरेन्द्र विक्रम सिंह गौतम
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