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राम का स्वभाव जिसने जाना, उसने भक्ति का मर्म पहचाना।

                
                                                         
                            राम को जानना हो तो,
                                                                 
                            
केवल राम का नाम मत लेना,
उनके स्वभाव को समझना,
उनके आदर्शों को जीना,
और उनके प्रेम में
अपने अहंकार को खो देना।

भक्ति केवल मंदिर की चौखट नहीं,
न पूजा, न कोई विधान है,
भक्ति तो वह निर्मल भाव है,
जहाँ प्रेम ही प्रार्थना,
और समर्पण ही भगवान है।

जिस हृदय में राम का संवाद उतर जाए,
वहाँ छल-कपट ठहर नहीं सकता,
जहाँ राम के चरणों में प्रेम जाग जाए,
वहाँ मन संसार में भटक नहीं सकता।

राम को पाने के लिए
वन-वन भटकना आवश्यक नहीं,
बस मन में करुणा जगा लेना,
किसी दुखी के आँसू पोंछ देना,
किसी टूटते विश्वास को थाम लेना,
और अपने सुख में
दूसरों का सुख बसा लेना।

राम वहाँ नहीं मिलते,
जहाँ केवल उनका गुणगान होता है;
राम वहाँ प्रकट होते हैं,
जहाँ मनुष्य के भीतर
मनुष्यता का सम्मान होता है।

राम का स्वभाव जिसने जाना,
उसने भक्ति का मर्म पहचाना।
जिसके हृदय में प्रेम समाया,
उसने राम को भीतर पाया।
-अखिलेश श्रीवास्तव*
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21 घंटे पहले

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