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दिल को रोने तो दे

                
                                                         
                            अब मैं कैसे इन शजर ए पत्तों से वफ़ा की उम्मीद रखू
                                                                 
                            
इनकी फितरत में शुरू से फिज़ा ए इश्क़ है मेरे शफ़ीक़
और तू कोई ऐसा तौर नही, जो वक़्त को शिकस्त करें
तुझे भी इक रोज़ ये वक़्त, वक़्त पर कमरा बंद कर ही देगा
क्या फिकर करें, मिज़ाज ए मौसम के बदलने पर हम
ऐसा हमारे माजी में पहली दफा तो ना हुआ, नया ना हुआ
मैं इस मंजर से राब्ता रखता हूं, दावा ए सुखन जानता हूं मैं
मेरे दामन में सर झुका कर तो देख, बात मान कर तो देख
ये सफ़र ए मंजिल है दोस्त, जाहिर है लोग चले ही जाएंगे
तू नज़र शदाबो पर रख, जल्द ही नए फूल खिल ही जाएंगे
तेरे मुस्तकबिल में बोहोत से लोग, तेरी फिराक में खड़े है
उनसे उनके उंस का हक़ मत छीन, नए अज़ल होने तो दे
ये दिल है दिल लगा कर, दिल को, दिल से रोने तो दे
तुझे दिल जलाकर और आंखें सुखा कर क्या ही मिलेगा
मुसलसल इन आखों को, आंख दर्द से मिलाकर रोने तो दे
ये साहिल यकीनन हिज्र में है लहरों को मत रोक मेरी जान
खत्मकर ये मैं की वहशत, इसे दश्त में तब्दिल होने तो दे।
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3 वर्ष पहले

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