लगा दो टैक्स सांसों पर,
तुम्हे जीने मरने से क्या,
लगी जब भूंख सिक्कों की,
तो, फिर रोटी जलने से क्या,,,
बहाया रक्त बर्फ़ों पर,
के,तुम ए.सी. में रह पाओ,
अड़े हैं खा रूखी सूखी,
निडर तुम घर आओ जाओ,,
अरे नेता जरा सोंचो,
हमारे पास भी , दिल है
जो रहता है, जंगलों में,
मगर अपनों में शामिल है,,
तुम्हे क्या फ़र्क पड़ता है,
करोड़ो है तुम्हारे पास,
यहां महीने का, अंतिम दिन,
ले आता है थोड़ी आस,,
कहीं सपने का बनता घर,
कहीं बेटी की, है शादी,
कहीं देनी बच्चों की फीस,
हुई इन सब की बर्बादी,
यहां सब कुछ टुकड़े में है,
इन्हें एकल करने से क्या,
लगा दो टैक्स सांसो पर,
तुम्हे जीने मरने से क्या,
वक़्त के हाथों इतना,
मजबूर हो गया हूं,
आज तो खुद मैं खुद,
से दूर हो गया हूँ,
(वक़्त साथ है तो जमाना साथ है,
बस नज़र रखो वक़्त पर)
-दीपेंद्र तिवारी मिर्ज़ापुरी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X