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तुम बढ़े चलो

                
                                                         
                            रूको नहीं,झुको नहीं, चले चलो।
                                                                 
                            
बीर तुम बढ़े चलो।।

आग की लपट यहां।
इंसान की कपट यहां।।

रहम की जगह नहीं
बेरहम बने चलो।
बीर तुम बढ़े चलो।।

धैर्य पास हो तेरे।
मीत खास हो तेरे।।

राग-अनुराग हो सखा
जय हिन्द कहे चलो।
बीर तुम बढ़े चलो।।

हस्त कृपाण कटार हो।
तिलक भाल सकार हो।।

लक्ष्य पर निगाह सदा
धरा धीर बने चलो।
बीर तुम बढ़े चलो।।

*दिवाकर ओझा"विधुबिहारी"


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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