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पद्मावती: ज्वाला की रानी

                
                                                         
                            चमकती थी दीप सी, जलती थी ज्वाला,
                                                                 
                            
चंद्र सी निर्मल, पर सिंहनी की आला।
चित्तौड़ की धड़कन, गर्व की कहानी,
स्वाभिमान की मूरत — रानी पद्मावती रानी।

जब घिरा अंधेरा, लालच के बादल,
आलाउद्दीन के सपनों में जली थी हलचल।
चाहा था झुकाना, उस उजाले को,
पर चित्तौड़ की धरती ने जन्मा था पत्थर नहीं,
इक जीता-जागता लावा।

आँखों में दर्प, तलवारों में अंगार,
एक नहीं, हज़ारों पद्मावती थीं तैयार।
ना हार का भय, ना मृत्यु का डर,
बस ललकार थी —
"मृत्यु स्वीकार है, पर बंधन नहीं!"

जौहर की ज्वाला में उठी वह पुकार,
लपटों ने बाँधा स्वाभिमान का श्रृंगार।
आग बनी आँचल, राख बना अहंकार,
पद्मावती ने रच दिया अमरत्व का सत्कार।

जल उठी देह, पर जली नहीं शान,
सुलग उठे अश्रु, गूंज उठा जहान।
आज भी हवाएँ कहती हैं कहानी,
"यह थी चित्तौड़ की, यह थी अस्मिता की रानी।"

सर झुके न झुके, पर दिल दहल जाए,
जहाँ भी गूँजे —
"जय भवानी! जय पद्मावती
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एक वर्ष पहले

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