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यही है मेरी ज़िंदगी

                
                                                         
                            क्या लगता है—
                                                                 
                            
ज़िंदगी वैसी होनी चाहिए जैसी हम सोचते हैं,
या वैसी, जैसी दूसरे हमारे लिए सोचते हैं?

ज़िंदगी का मतलब क्या है?
आख़िर क्या है ज़िंदगी?
पर उससे भी ज़रूरी यह है
कि आप जानें—
आपके लिए आपकी ज़िंदगी कैसी है?

मोहब्बत से भरी गुलाब की पंखुड़ियों-सी,
या उसके काँटों-सी चुभन लिए हुए?
अंगारों से बिछी हुई राह जैसी,
या कमलगट्टे की पंखुड़ियों जैसी कोमल?

मुझे तो लगता है—
मेरे लिए मेरी ज़िंदगी समझना है।
हाँ, सही सुना आपने—
समझना है—
समाज को समझना,
किताबों को समझना,
दायरे को समझना,
गरीबी को समझना,
हँसी को समझना,
देश को समझना,
दुःख को समझना…

वक़्त गुज़र जाता है
ज़िंदगी को समझते-समझते,
सीखते-सीखते,
जानते-जानते।

सूरज की रोशनी सिर्फ़ दिन तक सीमित रहती है,
पर दीया पूरे कमरे को उजाला देता है—
दिन–रात,
गरीब के चूल्हे की आँच बन जाता है।

बस…
मुझे भी अपनी ज़िंदगी को वही दिया बनाना है
जो छोटा सा हो,
पर वक़्त के साथ ज्ञान के तेल की ज़रूरत समझे।

आख़िर है तो मिट्टी का—
मिट्टी में ही मिल जाना है।
लेकिन जब तक मेरी ज़िंदगी रहेगी,
मैं उसी ज्ञान-रूपी तेल से भरी
एक छोटी-सी बाती लिए
पूरे कमरे में उजियारा करने की कोशिश करूँगी।

बस… यही है मेरी ज़िंदगी।
बस… यही है मेरी ज़िंदगी।
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8 महीने पहले

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