हर वक़्त की रौशनी को
जो समेट लेता है,
वही वक़्त उसका होता है।
हाँ… ये भी एक सोच है,
कि छोटा-सा प्यादा भी
कभी-कभी बड़ी जंग जिता देता है।
शौक़ से हराओ तुम मुझे,
शौक़ से लड़ो तुम मुझसे,
पर नीचता की हदें
कभी मत पार करना।
झगड़ो मुझसे, मतभेद रखो,
पर अपनी गंदगी
मेरे अस्तित्व पर मत फेरना।
कहा है किसी ने सही,
वक़्त गुज़र जाता है,
सयंम बरतने में भी वक़्त गुज़र जाता है।
पुरुष्कार को और अधिक
प्रतिफलित होने में
कभी-कभी पूरा जीवन गुज़र जाता है।
मैं जैसी हूँ, वैसी हूँ।
तुम जैसे हो, वैसे हो।
मैंने तो कुछ नहीं बदला,
यदि तुम वैसे नहीं रहे,
तो इसमें मेरी क्या गलती?
तुम बने नहीं,
तो मैं क्या करूँ?
समय के साथ,
समझ के संग,
हर लम्हे की छाँव-पनाह में
आगे बढ़ना ही पड़ता है,
क्योंकि कब क्या हो जाए
कोई नहीं कह सकता।
मैं अच्छी नायिका नहीं बन सकती,
पर हाँ—
एक अच्छा इंसान जरूर बन सकती हूँ।
और मुझे गर्व है
कि मैं एक अच्छा इंसान हूँ।
तुम भी हो—
ऐसा कभी मत सोचना कि नहीं।
तुमने ही मुझे
ऐसा बनने में मदद दी है।
ग़ुस्सा आता है,
दुख भी हुआ है—
पर वक़्त ने सिखाया है बहुत कुछ।
और जैसे श्रीकृष्ण ने
अर्जुन से कहा था—
“मैंने सब सिखा दिया,
अब आगे मेरा काम नहीं।
अब तू ही चलेगा,
तू ही जिएगा,
तू ही फैसले लेगा।”
बस अब यही सत्य है,
तू ही है वो…
और तू ही है वो।
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