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ग़ज़ल

                
                                                         
                            शर्म झलकती नहीं है आंखों में जिनके
                                                                 
                            
कभी निगाहें हम उनसे मिलाते नहीं।

पैसा लेकर खड़े हैं जो दिल के बाजार में
कभी बात दिल की हम उनसे बताते नहीं।

नमक मुट्ठी में लेकर फिरा करते हैं जो
जख्म़ दिल का उन्हें हम दिखाते नहीं।

बात करते थे जो कभी उम्रभर साथ की
आज कत्ल करने से वो भी हिचकिचाते नहीं।

फूल हाथों में लेकर मुस्कुराते हैं जो
खंजर दिल में चुभाने से वो कतराते नहीं।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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