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चौकीदार

                
                                                         
                            मैं इंसान नहीं भगवान राम का अवतार हूं
                                                                 
                            
दुश्मन की सेना के लिए देश का रडार हूं
तरह-तरह का मैं निभाता हूं किरदार
अब तो बूझो नाम मैं हूं कौन सा चौकीदार?

दुश्मन को अपनी बातों से डराता हूं
फुलझड़ी को परमाणु बम बताता हूं
बादलों के बीच से विमान उड़ाता हूं
जिसे पकड़ नहीं पाता दुश्मन का रडार।

गंदे नाले से मैं गैस बनाता हूं
घर-घर सिलिंडर पहुंचाता हूं
उज्जवला योजना को मैंने
पुरे देश में कर दिया है साकार।

देश के बेरोजगारों को मैं नित्य
नये रोजगार दिलाता हूं
डिग्रियां जलवा कर चूल्हों में
मैं पकोड़े तलवाता हूं
जश्न में डूबा है आज हर बेरोजगार।

देश को नये-नये ज्ञान से अवगत कराता हूं
विज्ञान के नये-नये सिद्धांत बनाता हूं
विपक्षी दल मुझ पर अविश्वास दिखाते हैं
सारी दुनिया में बतलाते हैं मुझको गंवार।

हर चुनाव में मैं नये नये जुमले गढ़ लाता हूं
हारी हुई बाजी को भी जीत जाता हूं
सत्ता के लिए मैं बेचैन हो जाता हूं
क्योंकि कुर्सी से हैं मुझे बेइंतहा प्यार।


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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