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उस भंवर में स्वप्न सारे गुम दिखे

                
                                                         
                            उस भंवर में स्वप्न सारे गुम दिखे
                                                                 
                            
जल प्रपातों में फंसे जब तुम दिखे.

बन गई यादें मियादी ज्वर सरीखी
हर लहर बढ़ते जहर सी अब दिखे.

प्रेम का पर्वत भी एकदम ढह गया
लुढ़कती शिलाओं संग दबते दिखे.

सृष्टि के सृष्टा ने त्रुटि स्वीकार की
आदमी कुछ बेशर्म भी हँसते दिखे.

माँ की ममता और समर्पण भाव भी
क्रूरता में काल की पिसते दिखे.

प्रकृति का उपहास संत्रास बन गया
देवता भी खुद मौन व्रत करते दिखे.
-दिनेश चौहान
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एक घंटा पहले

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