बिजली बादल बरसातें
बिन तेरे डसती ये राते .
पुरवाई का हर झोंका
तेरे आने का बस धोखा.
चमकी बिजली जोर से
नींदे उड़ जातीं शोर से.
हर दम देती झिड़की
रह रहकर ये खिड़की.
नभ में नीरद माला
रंग बदली का काला.
मेघ भी दूत नहीं बनते
पर्वत पीड़ा के जब फटते .
- दिनेश चौहान
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