तुम नदी की बाढ़ बन फैलो हमारी बांह में
घाट बन दोनों किनारे होंठ सिमटे आह में.
साँस सारी सिमट जायें बनके पुरवाई पवन
बिजलियाँ चमके गगन में सिर्फ तेरी चाह में .
-दिनेश चौहान
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